अरे चौधरी साहब आये नहीं अभी तक " सब अपनी घड़ियाँ दुरुस्त करने लगे . तभी काली अम्बेसडर आकर रुकी , सब खड़े हुए अदब से . चौधरी साहब निकले , और मंच की ओर बढ़ने लगे . इनके आते ही गाँव वालों में भय , अपनापन , प्यार , क्रोध न जाने कौन कौन से भाव आ जाते हैं . यूँ तो चौधरी बड़े अदब , शान , रुआब वाला इंसान है पर उम्र के भी तो फंडे हैं मियां . अब लगभग ८० बसंत देख चुके हैं . देखने को वैसे इन्होने शायद ही कुछ छोड़ा हो . भारत की आज़ादी से लेकर , कांग्रेस के घोटाले तक , सब देख चुके हैं ये . किसी ने आते ही फूल माला से स्वागत किया , किसी ने माइक पकड़ा दिया . उन्होंने कुछ चार पांच बोल भी कह डाले . बोलकर फिर बैठ गए अपनी कुर्सी पे. फिर से पुरानी यादों में खो गए .इंसानी बुढ़ापा , यादों की खुराक में ही कटता है.
अस्सी बरस बाद भी अगर कुछ बाकी है तो वो है इनके लिए गाँव वालों में सम्मान , डर और वो दो तलवार नुमा तीखी मूछें . हाँ बिलकुल तलवार नुमा , किसी न्नाजुक गले पे चला दो , तो मेरी कसम लहू टपक जाए. तभी ऐलान हुआ , इस बार गाँव के इंटर कॉलेज में टॉप किया है " सरिता " ने . ये नाम जब भी चौधरी के कानों में पड़े तो जलजला मच जाता है इनके अन्दर. मंचासीन कुछ लोगों को भी ये नाम अटपटा सा लगा. खैर वो लड़की मंच पे आई तो चौधरी ने इनाम दिया , बनावटी मुस्कुराहटें पास हुयीं . कार्यक्रम चल रहा है . बगल में बैठे चौधरी के पुराने जिगरी "ठाकुर साहब " ने उनका हाथ थामकर उन्हें कुछ दिलासा सी दी. चौधरी को फिर वही पुराना मंज़र याद आ गया , दिन कौन भूल सकता है " १५ अगस्त सन १९८०
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२० साल पहले
गाँव होशियारपुर में , १५ अगस्त सन १९८०
चौधरी ने सरिता को धमकाते हुए कहा " उस मुंडे का हाथ छोड़ दे कुड़िये "
सरिता रोते हुए पर बुलंद आवाज़ में बोली - " मर जावांगी पिता जी , पर साथ न छोडूंगी "
सरिता और पड़ोस के गाँव का मनोज जो तथाकथित छोटी जाति का है , लगभग पूरी तरह खून में नहाये हुए हैं , कटार अभी भी चौधरी के हाथ में हैं , उसके सर पे खून सवार है , आँखें तमतमाती हुयीं , लाल मानो खून उगल रही हों , उसके साथ उसके बेटे धीरज और जय वीर सिंह भी हाथों में तलवारे लिए खड़े हैं . सरिता और मनोज भाग नहीं सकते .अब या तो आज मनोज मर जाएगा जो पक्का है या सरिता बच जायेगी अगर वो मनोज का हाथ छोड़ दे. चौधरी पिछले काफी समय से सरिता से बहस कर चूका था . सरिता न मानी . मनोज संग भाग खड़ी हुयी . चौधरी को मानो काटो तो खून नहीं .उसकी अपनी बेटी और एक छोटी जात वाले के साथ.
तभी चौधरी आगे बढ़ा , मनोज - सरिता ने सहम कर एक दुसरे को कस कर पकड़ लिया . चौधरी ने सरिता का माथा चूमते हुए कहा " रब राँखा पुत्तर "
फिर जयवीर को कुछ इशारा करते हुए जीप में जाकर बैठ गया , जयवीर आगे बढ़ा , सरिता और मनोज ने एक दुसरे को आखिरी बार देखा , पहले दोनों को अलग किया गया , फिर दोनों को काट दिया गया . शायद कसाई ने भी कभी इतनी बेरहमी से किसी मुर्गे को काटा हो. सर अलग , धड अलग , कोई हिस्सा यहाँ , कोई कहीं और बिखरा हुआ . पर चौधरी रोया नहीं कसम से . क्यूँ रोये उसकी आन , शान पे हमला करने वाला बख्शा नहीं जाएगा , फिर भले ही वो उसकी खुद लड़की ही क्यों न हो .
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तभी मंच पर तालियों की तडतड़ाहट ने चौधरी को जगाया , अतीत के काले पन्ने फिर उसकी बंद किताबों में समां गए . जो किताब उसने किसी संदूक में बंद कर अपने काले अतीत में छिपा ली है .सच क्या गौरवशाली दिन जिए हैं उसने . पर क्या खाक जिया है . पिछले २० सालों में ऐसा कोई दिन नहीं जब उसे सरिता याद नहीं आई . कितनी नन्ही सी थी , परी जैसी जब उसकी गोद में वो आई . उसे दो ही चीज़ें प्यारी थी एक तो वो गोल मटोल प्यारी सरिता और दूसरी अपनी "तलवार नुमा , तीखी मूछें " पर मूछ और बिटिया में मूछें आखिरकार जीत ही गईं. गाँव वाले कहा करते " क्या रुआब है , देखो तो चौधरी ने अपनी आन नहीं जाने दी " जब भी राह चलते वो ये सुनता उसे अपनी मूछों की जीत ठीक ही लगती . पर कहते हैं न अक्ल , माया , ममता से कितनी भी दुश्मनी पाल लो वो बुढ़ापे में दबे पाँव आ ही धमकती है .आज उसे ये मूछें बिलकुल नहीं सुहातीं . जब भी वो आईना देखता है , उसे शर्म आती है . पर अब क्या होवे , जब चिड़िया चुग गयी खेत .माफ़ी मांगे भी तो भला किस से , कैसे , क्या उसके कद का आदमी ये कुबूल कर ले के उसने जो किया गलत किया . वो अपना जुर्म कुबूल करना चाहता है . लेकिन अब ये मुमकिन नहीं , अब शायद उसे अगला जन्म ही लेना पड़े. ये मूछें रुढ़िवादी समाज की वो जन्जीर है जिसकी कैद से वो कभी नहीं छूट पाया , इतनी हिम्मत उसमे थी ही कब . इसी कशमकश में उसे याद ही नहीं कब वो आखिरी बार चैन की नींद सोया होगा. डॉक्टर भी कहते हैं , इन्हें कुछ अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है . चौधरी के अन्दर से बस यही बात अब निकलती है " मैं माफ़ी के लायक नहीं , मैंने क्या कर दिया , अपने ही उगाये फूल को उखाड़ फेंका , हे भगवान , मुझे उठा क्यूँ नहीं लेता तू , ये हर दिन की जिंदगी की सजा अब बर्दाश्त नहीं मुझे "
जलसा ख़तम हुआ , चौधरी उठा , उसकी आँखों में आंसू थे , मन गम जदा था पर फिर , आंसू पोछते हुए ,वही अपनी तलवार नुमा मूछों पे ताव देते हुए , धीमे धीमे उठे . तभी एक महोदय कहने लगे " भगवान् झूट न बुलाये , चौधरी साहब की जैसी मूछें कभी कहीं नहीं देखीं " चौधरी ने एक बनावटी मुस्कराहट दिखाई , वास्तव में ऐसी मूछें उस इन्सान ने शायद ही कहीं देखीं हों , ये मूछें कोई आम नहीं , कभी किसी बाप को उसकी बेटी का क़त्ल करने पर मजबूर भी करती हैं , और फिर उस बाप को दे ज़ाती हैं , एक ऐसा नासूर , जो कभी नहीं भरता , ताउम्र रहता है , हर पल हर लम्हा उसे कचोटता रहता है . चौधरी अपनी कार की ओर बढ़ा , एक ओर से आवाजें आ रही हैं " चौधरी साहब जिंदाबाद " , चंद लोग फिर फुसफुसा रहे हैं " असल चौधरी है , आन , बान शान ही सब कुछ है इनके लिए " कुछ नए लड़कों ने पाँव छू लिए . चौधरी हर दिन भीख में मौत मांग रहा है ऊपर वाले से , और उसका रब उसे हर दिन जीने की सजा फरमा रहा है . शायद यही उसका इन्साफ है , ओर यही उसकी सजा.